कशमकश की दौड़ में उलझी सी है ज़िन्दगी
इस दौड़ में भागते इंसानों में धुँन्ध्ती है किसी अपने को ज़िन्दगी,
कभी अकेलेपन से दूर,तोह अभी अपनो से दूर भागती है ज़िन्दगी,
बनाती है अन्जांनो से ये रिश्ता
तोह कभी तोड़देती है अपनो से ही नाता
कमी को दूर करने को भागती रहती है खुद से
लेती है ज़ख्म अपने ऊपर,
मगर फिर भी रखती है मुस्कराहट अपने चेहरे पे
शायद डरती है खुद की सचाई से
आईना दिखती तोह है,पर छुपे हुए चेहरे को ढकने के लिए
छूता है कोई गहरई में जाके
तोह रोक नहीं पाती है आसुओ के समंदर को,
तडपती है खुले अस्मा के निचे,
रोत्ती है थोड़े से और आसमा के लिए
कभी खुद को ही अनजानी सी लगती है,तोह कभी पहचानी सी
देखके भीड में अपने से चेहरे को कभी खिल भी जाती है
तोह कभी अपने से ही बागती है ये ज़िन्दगी.
मुझे तोह समझ नहीं आ पाती है
पर फिर भी हँस देती हु में इसके खेल पे.
शायद सोचके ये
के कभी तोह मेरे साथ चलेगी ये ज़िन्दगी
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