Tuesday, December 2, 2008

आज ज़िन्दगी

आज ज़िन्दगी बन गई है बेबस सी
कफ़न में लेती है साँस हर वक्त
किसी दस्तक से कॉप ऊड़ती है रुहू
किसी आहट से सहम जाती है ज़िन्दगी
जीने की चाहः बान कर रह गई है ज़िन्दगी
पर नही जीना है खौफ में
गुलामियत की फितरत से परे चलो
आज़ादी का जशन बनाना चाहती है ज़िन्दगी
ये सपने है ग्हुलामो के
जो बुन कर रखे है बेडीयो में
पंख देना चाहते है सपनों को
साहस देना चाहते है उमीद्हो को
तोड़ कर उडा दो ईन को
डर में जी नही पायेगी ज़िन्दगी
उम्मीद की डोर से उदो ले चलो जिन्दगो

1 comment:

अभय कांत श्रीवास्तव "अक़्स" said...

You can write in Hindi better than English.Its a fabulous poem..You described the "bebasi" using such a gr8 thoughts and words that made this poem "dahkati huyee" in my mind.I am sure everyone feel and will feel it.