Thursday, March 5, 2009

निदा फाजली

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम
थोडी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी करीब रहे दूर ही रहे

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ होता है यु

साहिल की गीली रेत पर बच्चो के खेल-सा हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ

निदा फाजली